घास


भूमि के आधिपत्य के गुरूर में चूर खड़ा,
एक आदमी घास को निहारता था।
घास कैसे उसकी भूमि पर अड़ी खड़ी,
इस बात पर वह दहाड़ता था।

घास अक्सर ऐसे प्रलाप में भूमि में सिमट रह जाया करती है,
या तो पचड़ों से बचती, या शायद उस विराट शरीर से डरती है?

मगर मौसम कुछ और ही था, घास ने आज जवाब दिया।
"मनुष्य मुझे क्या रौंदता तू ! इतिहास तुझे बतलाती हूँ,
भूमि के आधिपत्य की परख़ तुझे सिखलाती हूँ ।

तेरे सृजन से भी पहले, मैं इस भूमि पर हूँ तनी हुई!
खून बहा, आघात हुआ इस भूमि पर,
लेकिन न जाने क्यों मैं मौन रही?

बाँटने में तो तुम ही पारंगत हो, इस युक्ति का मुझको ज्ञान नहीं।
हरी चादर की शीतलता से जग ढांकूँ मेरा काम यही।"

खुद की ही लघुता पर खीझता सा, वह मनुष्य कुछ सकुचाया ।
फिर खड़ा मौन,
अचानक ही उसके मुख से वाक्य एक निकल आया:-
"मगर.... ईश्वर ने हमको ही इस भूमि को प्रदान किया,
धर्म के उत्थान का कार्य हमारे हाथ दिया ।"

बोलते ही वह घास के ताप को भाप गया।
पर शब्द कब वापिस जाते हैं।
जीव्हा से निकलते ही वह अपना मतलब सार्थक कर जाते हैं।

घास ने अपनी शीतलता छोड़, कठोर स्वर में उससे सवाल किया:-

“धर्म की परिभाषा जानते हो ?
या विलास को धर्म पुकारते हो?

ये कैसा अधर्म है जो भूमि पे बंधु बंधु को मारे ?
और पकड़ा जाए तो अपने ईश का नाम ले पुकारे ।

घोंघा तो मनुष्य वो था नहीं।
अपनी विलासिता को पहचानता था,
उसकी तृप्ति के लिए ही वो झूठ का दामन थामता था।

उसी स्थान पर खड़ा हुआ अपनी कायरता को दुत्कारता था।
जो घास मौन भूमि पर अब, उसको मन ही मन पुकारता था।