गमच्छा


धूप में खड़े, कंधे पर गमच्छा लगाए।
सच्चे, निडर थे, वो हरिहर कहलाए।

मेहनत से इनका नाता गहरा बड़ा था।
कमाते थे कम, पर गौरव बड़ा था।

पर एक दिन नया कुछ ऐसा जो जाना,
कंधे से उठा सर पर गमच्छा था ताना।

बने नेता, सबकी करते थे भलाई।
देश-विदेश में इनकी बड़ी थी बढ़ाई।

भलाई, हित में ख्याल कुछ आया।
हरिहर ने फिर हर पन्ने पर अपना दस्तख लगाया।

जब मन साफ़ भला था, तो दिक्कत ही क्या थी?
उसकी नज़र को गलती की हिमाकत ही क्या थी?

अकेला सच का प्रभारक कौन ही बन पाया है?
पर भूलो नहीं हरिहर ने साफ़ मन पाया है।

समय का पहिया घूमा, हरिहर ने स्वप्न दिखाया।
"सत्य ही जीतेगा" यह ज़ोर से चिल्लाया।

पर सत्य की चीखें तो उठती नहीं हैं,
कौन कह सकता अकेला क्या गलत क्या सही है?

सोचा था यह हित में, तो यह नियम लगाया,
खुद को ही विचारों का प्रबंधक बनाया।

करते-करते सोचा व्यापार का हित हो,
कोई एक के अधिकारों पर क्यों सबका अहित हो?

अपने विचारों का घर वो बन ही चुका था,
जब तक न वो एक खत ही पढ़ा था....

उस खत ने उसका जीवन उसको याद दिलाया,
कोई भी सही नहीं सर्वदा यह उसे बताया।

समझा अपनी गलती उतारा वो गमच्छा,
आज़ादी और प्रजातंत्र की कीमत को समझा।

सभी मील सही हैं, कोई अकेला नहीं है,
खुले हों विचार हित मे यही है...

हरिहर फिरसे बोला, नहीं अब चिल्लाया।
सोचना है, न चीखो, यह सबको बताया।

चीखने से तो बातें बनती नहीं हैं।
गलत होने में कोई गलती नहीं है।

संग जबतक खड़े हो आगे बढ़ोगे,
बटोगे जब भी, सदा नीचे गिरोगे।

तो चलो आज मिल ये बीढ़ा उठाएँ।
प्रजातंत्र की अब कीमत समझ जाँए।