दीपक


दीपक की ज्वाला से झुककर भी देखो उसकी छाँव को,
अंधकार में दिखते उन तारों को याद करो।

यह तारे ओझल हुए कहाँ, वह काली रातें बीती कब?
उत्थान अभियान की दौड़ में हम अंधकार को भूले कब?

पृथ्वी तारा सी लगती है, उसके ही तारे खोए हैं।
सरे-आम कटते जंगल, पर दिन में मानुष सोए हैं।
वह जीव जो सोचा करते थे, किस तुनक-धाँस में खोए हैं।

रोशन जग की चौंध में आँखे भी बुझ जाती हैं।
कभी-कभी दीपक तले ही सच्चाई दिख पाती है।

तो चलो आज उस छवि की छाँव पर नज़र डालें,
अंधकार को देखने का नज़रिया अब बदल डालें।