झूठ


कभी किसी ख्याल से उपजा,
तो कभी किसी ने जचा-रचा।
अदभुत शक्तियों से भरा,
एक झूठ जग फ़तह को चला।

चला दूर दर-दर चला,
फ़िर जाकर कुछ सच से मिला।
मिला ऐसा कि अलग हो न सका,
जग धर्म-जात भेद में जो था लगा,
सच-झूठ में भेद न कर सका।

सफ़लता की राह में इन्हें कई दत्तक भी मिलते हैं।
कई हैं वो विक्रेता जिनके कंधे ये पकड़ते हैं।

इंटरनेट पर चला तो कोई तथ्य हार गया।
चटकारे जिससे आ पाए वो ही तथ्य तो पार गया।

पर इस सत्य-तथ्य की हत्या पर कब जग ये शोक मनाता है।
कितनी ही गर्दन कट जाँए इनका कब क्या जाता है,
जितनी गर्दन मुड़ती हैं, उनसे ही तो धन आता है।

इंटरनेट से उठ वो फ़िर चला, आगे बढ़ा।
किसी चैनल पर पनाह मिली तो वहाँ समाचार बना।
चला दूर कुछ तो किसी चर्चा का अलंकार बना।
झूठ जो था देखो कैसे वो सिकंदर सा महान बना।

-सिध्दान्त गोयल



विविध कविता