गज़ल बेनाम


इक अजब सा है सिलसिला अपना।
मंज़िलें उसकी रास्ता अपना।

रोकते भी किसी को क्या आख़िर।
हर किसी का था देवता अपना।

ज़िक्र जितना बयाँ किया हमने।
दर्द उतना ही है बढ़ा अपना।

ज़िंदगी पर बहुत भरोसा था।
इसने भी ख़ूँ फ़क़त पिया अपना।

हाँ ख़ुदा ने बहुत दिया लेकिन।
फिर भी क्यों जी नहीं भरा अपना।

-बलजीत सिंह 'बेनाम'



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