तथ्य

तार-जाल के इस युग में तथ्य खूब मिल जाते हैं, कुछ होते सच, कुछ झूठ कभी, पर ज्ञान नहीं कहलाते हैं। गत्य-सत्य की परिभाषा में क्या ज्ञान कभी तुल सकता है? भाषा जिसके संचार को हो वो कब अंकों में घुल सकता है? कितने नर हैं इस धरती पर? कितना जल है इस भूमि पर? जल के अंत पर क्या होगा कहर? यह सवाल नहीं कुछ मुश्किल हैं! पर जानता हर तथ्य हर पोथी को वो भी ज्ञानी कब कहलाता है? तथ्य नहीं, सत्य नहीं, ज्ञान तो केवल संवेदना से आता है। हर कड़ी को जोड़ जो जानता है सच, ज्ञानी वही कहलाता है। सब कुछ नहीं वो जानता है, जब यह मनुष्य मानता है। समझ कर गाथा की गहनता ही पक्ष जो बनाता है। न जानता है जो समझे यह, ज्ञानी वो ही कहलाता है। तथ्य नहीं, सत्य नहीं, ज्ञान तो केवल संवेदना से आता है। तो तथ्य-तथ्य की बात न कर, समझ उन तथ्यों से ज्ञान अमर। जान भी ले हर पक्ष को, पक्ष बनाता है तू अगर।