कान


समाचार की चीख भी सुनते,
टेलिफ़ोन की टुन-टुन भी।
पर यह धारा जो बहती, इस पर इनका बस नहीं।

सच-झूठ का भेद न जाने, कान तो बस नित सुनते हैं।
असत्य को ही तथ्य मानकर कारण उसके गुनते हैं।
पर इनकी इस धारा को हाथ न इनके चुनते हैं।
जो जलाते हैं वो हाथ अलग हैं, पर शहर और ही कारण जलते हैं।

अज्ञानता के इस खेल में आँख भी उनकी साथी हैं।
हाथ को दोषी मानती हैं वो कारण समझ न पाती हैं।
मुफ़्त-मुफ़्त के नारे सुन अपनी कीमत भूल जाती हैं।

चार विचार का संगम जो जादू से सा आ जाता है।
यह कारण से की वह आपके समय से धन बनाता है।
समय की इस लड़ाई में सच तो कहीं खो जाता है।
ज्ञान ही नहीं अज्ञान भी तो फिर भावों से ही आता है।

चलो आज इस धारा से हटकर जग को देखें।
मोबाईल को जेब में डालकर सिर अपना ऊँचा रखें।
विचारों का संचार करें, कुछ भेजने से पहले विचार करें।

सच में जब आदान प्रदान होगा, तब ही सच जीतेगा।
अज्ञानता के बादल छटेंगे, तकनीकि कलयुग बीतेगा।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता