ऐनक


आज़ादी की वो ऐनक जो शीशे की दीवारों में रहती है,
ना जाने मखमल की चादर पर रखी वो क्या-क्या कहती है!

आज़ादी के उल्लास के संग,
वो बटवारे से भी थी तंग।
विदेशी कपड़ा जिसने जलते देखा,
वो है अब विलायती मखमल से दंग।

स्वतंत्र देश के स्वप्न को जिस निष्ठा से स्वीकार किया,
धर्म-जाति पर बँटने का उतना ही उसने धिक्कार किया।

इस ही भूमि के लाल जो हैं, उनका लाल रक्त भी दिखता है,
गज-गज पर ये लड़ाई देख, उसका हृदय भी दुःखता है।

आस करे वो उस दिन की, जब भूमि की असली कीमत हम समझेंगे,
हर पशु, पक्षी और जन को सृष्टि पर रहने देंगे।
आँखें होती तो मूँद भी लेती शायद,
पर यह ऐनक स्वतंत्रता प्रहरी है,
आज़ाद देश का ये हाल देख, चोट लगी इसको एक गहरी है।

चलो आज उस ऐनक की आँखों से जग को देखें,
नए देश की नई किस्मत को अपने हाथों से लिखें।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता