सिक्का


इधर-उधर उठता पटकता,
खन-खन कर जग में भटकता।

प्रभु के चरणों में समर्पित,
तो कभी अग्नि को अर्पित।

सत्य का चिह्न बनकर,
क्यों रह गया मैल से सनकर?

क्या सच में हैं दो पहलु मेरे?
क्यों देखता फिर नित रूप नवेले?

लिफ़ाफ़े से जुड़ा सम्मान हूँ मैं।
एक बच्चे की मुस्कान हूँ मैं।
मैं ही हूँ फिर भीख भी क्यों?
एब भी कई मुझी से तो।

कई वर्षों का ज्ञान लेकर,
मनुष्य को एक माध्यम देकर,
सदैव अपने धर्म को तत्पर,
चलता हूँ मैं आगे बढ़कर।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता