हार के बाद जीत


मैं बीते दिनों को भूल जाऊँगा।
मैं काली रात पर चाँद की तरह छाऊंगा।
सवेरे का सूरज ना हो नसीब में मेरे।
मैं डूबते सूरज की लालिमा को मस्तक पर लगाऊंगा।
गड्ढोंभरी रही हैं राहें मेरी।
मैं उन्हीं को अपनी मंज़िल बनाऊंगा।

लोगों ने उछाला है कीचड़ मुझ पर बहुत।
में उसमें कमल की तरह खिल के दिखाऊंगा।
मैं बीते दिनों को भूल जाऊँगा….

एक ऐसा भी समय था जब लोग मुझसे मिलना।
मेरे साथ बैठना फक्र समझते थे।
फिर एक ऐसा भी दौर आया ।
जब लोगों ने मेरी परछाई से पीछा छुड़ाया।
में उन काले दिनों की यादों को अपना हथियार बनाऊंगा।
में बीते दिनों को भूल जाऊँगा…

नदी में गिरता हुआ झरना मन को बहुत लुभाता है।
इसके नीचे खड़े हो जाओ तो पाँव लड़खड़ाता है।
जब ज़िंदगी में चमक आती है।
तो चाटुकारों की फ़ौज़ लाती है।
और बुरे दिनों में सब कड़वी बातों में बदल जातीं है।
मैं इन्हीं बातों को अपना पथ प्रदर्शक बनाऊंगा।
मैं बीते दिनों को भूल जाऊँगा…

पूर्णिमा का चाँद जग को जगमगाता है।
फिर धीरे- धीरे अपनी रोशनी देकर लुप्त हो जाता है।
फिर वो नई आशा के साथ इस दुनिया में आता है।
और सब पर छा जाता है।
मैं उसी को अपना आदर्श बनाऊंगा।
मैं बीते दिनों को भूल जाऊँगा।
मैं काली रात पर चाँद की तरह छाऊंगा।

-सुनील गोयल



विविध कविता