नारी

मैं नारी हूँ , टेढ़े मेढ़े इस पग पर सीधे चलने की तैयारी हूँ , मैं नारी हूँ । एक आँधी अगर आ जाएगी , जो मेरा वजूद हिलाएगी , मैं सहलूँगी । पर अपनों पर उठती उँगली को , ना शय दूँगी , मैं घर बनाने वाली नारी हूँ , पर फिर भी मैं बेचारी हूँ । तुम मुझे कैद कर सकते हो , पायल की जंजीरों में जकड़ते हो , मैं खनखनाते हुए झमझमायूँगी , इस बादल से आजाद हो सागर में मिल जाऊँगी , मैं नारी हूँ । मैं नदी हूँ मैं सेना हूँ , मैं तेरे घर का गहना हूँ , हूँ मैं ही तेरी थाली की रोटी , अन्नपूर्णा बन मैं ही रहती , मैं घर बनाने वाली नारी हूँ , केवल तेरी सोच में मैं बेचारी हूँ । मेरे दस्तावेज़ तेरे नाम के बिना अधूरे हैं , पति पिता के नाम की रट लगाए हर पग पर संकट गहरे हैं , तू भूल गया तेरा वजूद जो मुझसे है , एक माँ की ममता का ये भी कोई फल है , कभी भड़कती चिंगारी कभी तेरी कायरता की सवारी हूँ , मैं नारी हूँ । ऊँचे मुकाम छू लेने पर तू भूल गया , मेरी मरफ़त के सुकून का कोई मोल न किया , मैं भी भुला देती इस नाशुक्रता को , पर आरोपों के उन पुलिंदों को कितना सहूँ , तेरी असफलता को कितना अपने माथे मढ़ूँ, मैं नारी हूँ । जब मुझ में चंडी आती है , आग बन जल जाती है , नौका फिर चाहे जिस छोर खड़ी , इसकी लपटें उसे पार लगाती हैं , मैं नारी हूँ । भूल मत कर बैठना ये कहने की, कि मैं बेचारी हूँ , मैं नारी हूँ ।