लकीर


यूँ ही एक रोज़ मैं।
चला लकीरों की खोज में।

नक्षों में बनी थी वो।
ज़मीन को बाटती थीं जो।
पर उनके सिवा भी थी कई और सैकड़ों।

मन के अंदर झाककर।
हैरान था मैं जानकर।
धर्म लिंग जात, देश, वेश, और रंग से जगको बाटकर।
खुश थे हम व्देश को स्वीकार कर।

एकता के बल पर जो बढ़े।
बंधु आज वो थे लड़े।
अचेत भूमी पर पड़े।

धन के लालच में अंधे।
माया जाल से बंधे।
मनुष्य हैं बटे खड़े।
अचेत भूमी पर पड़े।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता