कागज़


भूमि पर एक दिन जा गिरा ।
इस अनजान जग से कुछ डरा-डरा ।
समय ने अपना कार्य करा ।
एक बीज बरगद का विशाल वृक्ष बना ।

मैं ही चिड़िया का बसेरा था ।
मनुष्यों से संबन्ध भी गहरा था ।
सुनता था नित एक नई कथा ।
दु:ख-सु:ख की सबकी कोई गाथा।

आज़ादी का आभास देख।
सन सैंतालीस का उल्लास देख ।
इस आज़ाद देश को देख-देख मैं हर्षाया ।
फिर अगले ही क्षण कंठ भी मेरा भर आया ।
बटे हुए देश के ख्याल ने मुझे सताया।

इस दु:ख मे डूब खड़ा हुआ ।
भूख के दृश्यों में भी अड़ा हुआ।
समय ने फिर कुछ काम किया ।
भू पे था मैं अब पड़ा हुआ ।

आज़ादी का पैगाम बनने का मौका तो मैंने न पाया।
पर उन्नति की मांग ने मुझको कागज़ बनाया ।
ज़मीन की कीमत ने शायद मुझको अपना दाम दिखाया।

बटे हुए इस देश में बन एकता का पैगाम ।
किसी स्वतंत्रता सैनानी से कम नहीं था मेरा काम ।
अपने इस सफ़र को देते हुए विराम ।
आज जलकर करूँगा एक मनुष्य को ऊष्मा प्रदान ।
सदा रहे सच्चा मेरा दिया सब ज्ञान ।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता