जीवन


जीवन जब यह सीमित है, तो मृत्यु से क्या डरना?
क्यों न कराए सुकर्म हमसे, अमर बनने की प्रेरणा?
धन तो तुच्छ है इस पर, क्यों अनादि जीव को मरना।
सृष्टि पर आए हो तो, दुख दूजे का है हरना।

भेद-भाव की बातों पर ना हमको है बिगड़ना।
पत्थर काँटे कई मिलेंगे इनसे तुम्हें है बचना।
पृथ्वी पर ना बोझ बनो, तुम हो ब्रह्मा की संरचना।

कई लोभ तुम्हें रोकेंगे, पर तुम्हें नहीं है थमना।
जीवन के इस अनित्य मार्ग पर, सहर्ष अकेले चलना।
समाज यह शिल्पकार बनेगा, पर तुम्हें नहीं है ढलना।
दुनिया में अपवाद बहुत हैं, इसे तुम्हें बदलना।

सबकी समझ से परे है इस कवि की संवेदना।
सच्चे मन के ही बस में है, इस रचना को समझना।
सृष्टि पर जन्में हो तो, कर्म तुम्हें है करना।
जीवन के इस अभीष्ट मार्ग पर अभय अकेले चलना।

जीवन जब यह सीमित है तो मृत्यु से क्या डरना?
धरती पर आए हैं तो बस कर्म हमें है करना।

-सिद्धांत गोयल



विविध कविता