जाम


जब शाम हो सबके हाथों में जाम हो ।
पर ये गुमान हो की ज़िंदगी ना कहीं बदनाम हो ।
ना बहके कदम तेरे इसमें ही तेरी शान हो ।
ना करे कोई तुझसे शिकवा बस यही तेरी पहचान हो ।
जब शाम हो सबके हाथों में जाम हो ।
बात जब पीने की चले तो ना बाकी कोई अरमान हो ।
और जब बात पिलाने की हो तो सब तेरे मेहमान हो ।
जब शाम हो …..

-सुनील गोयल



विविध कविता