डाकपेटी


शहर की चकाचौंध में छिपी हुई,
एक डाकपेटी खड़ी है डटी हुई।

गुलाम देश में जन्मी थी,
सैनानी वह कहलाती थी,
आज़ादी का पैगाम लिए कभी
तो कभी प्रेम की चिट्ठी इसमें आती थी।

पेड़ से भी अटल थी वह,
पत्थर कुल से जो आई थी।
जिस लोहे से बनती थी कड़ी,
उससे ही चाबी बन पाई थी।

तारों भरी रातें फिर बीत गईं,
तारों की बिछीं अब जाल नईं..
पत्रों के अभाव में अब ताला उसका खुला नहीं।

अब खड़ी है वो स्वतंत्र वहीं,
उस अतीत-जीत का स्मारक बन।
जब पैगाम पढ़ो वो आज़ादी का, तो याद रखना उसका यह जतन।

बिन शब्द खड़ी वो बोलती है,
इन शब्दों को तुम याद रखो।
"स्वतंत्र रहो, लड़ो सच के लिए, अत्याचार पर झुको नहीं।
हाँ! विचार करो, कुछ सोचो भी, पर डर से तुम अब रुको नहीं।"