गुगोलपुर


गुगोलपुर में दर्जनों वासी थे,
सभी ज्ञान के अभिलाषी थे।

सन सैंतालिस में एक बीड़ा मिल उठाया था,
जोड़ के धन शहर में पुस्तकालय एक बनवाया था।

कुछ काव्य गीत, कुछ ज्ञान प्रीत, गाते थे सब चाहे भिन्न रीत।
अलग होकर भी जानते थे सब एकता की वो एक सीख।

यूँ ही हँसते गाते कई वर्ष बीत गए।
किताबों का युग बीता, आए फिर कुछ नियम नए।

बड़े-बड़े अखबारों की बाहें थर-थर कापती थीं।
वहीं इंटरनेट पर चंद कंपनी झूठ मज़े से छापती थीं।

शब्दों की कीमत भूल गए, अब तो मनुष्य की कीमत आँकते थे, क्योंकि कहीं कभी स्वीकार किया तो उसके जीवन में झाँकते थे।

वर्तमान में, इस युग में खुली थी हर आवाज़ नहीं,
जो भाता था उस आँख को देखती थी वो दृश्य वही।

इस झूठ-लूट में देखा सबने ज्ञान की मूरत को,
नईं आँखों से देखा इस डूबते वर्तमान की सूरत को।

चका-चौंध से उठकर, वापिस अपना अधिकार लिया,
बिन जाने स्वीकार करने को अस्वीकार किया।
अपनी कीमत समझी तो वापिस निजता का अधिकार लिया।

चलो उन दर्जनों की भूल से, सैकड़ों सीखें अब।
जानें, समझें और करें, चलो आज हम बदले जग।

-सिध्दान्त गोयल


विविध कविता