पतंगा


मैं पतंगा मामूली सा !
हवा की तरंगों में घूमता हूँ ,
अंजान से इस जग में ही अनमोल उत्तर ढूँढता हूँ।

मनुष्यों की गाथा सुनी थी।
नित देखी उनकी प्रतिभा की कहानी।
पर आज यह क्या देखता मैं, जग ने की क्या कारिस्तानी?

जिससे हजारों कीट ऐसे डर के थर-थर काँपते थे,
उससे कभी टकरा भी जाना वो हिमाकत मानते थे,
वो खड़ा था सिर झुकाए,

न ज़मीन से जुड़ा , न आसमान को भेदता था,
चेहरे पर मुस्कान तो थी, पर हृदय में खेद सा था |

हाथ में जो रोशानी थी, उसकी ओर भागा मैं जब,
खुद को जीवित पा दंग रह गया,
क्या अजब ये रोशनी है ! जिससे न जला शलभ?

अगर यह दिव्य रोशनी थी, तो उसके हृदय में खेद कैसा?
रोशनी का रोशनी से यह गजब सा भेद कैसा?

प्रश्नों के इस भंवर में फंसा, मैं चिंतन कर यह सोचता था,
इस उपकरण की रोशनी में ही सारे उत्तर खोजता था।

कुछ कंपन भांप, तभी उड़ा मैं उस फ़ोन के तल से।
जान गया अब यह पतंगा,लक्ष्य की उस भूल को भी।
क्यों भूतल पर रोशनी को भेदूं?
जब रोशन यह गगन पड़ा है!
रोशनी से क्यों जले, जब खुद वो रोशन करने को बना है।