नए डॉक्टर


गाउन मास्क और सिर की टोपी
आजकल बस आँखों से पहचान होती
हां आवाज़ है और चश्मा भी है
पर इस नए सफर में ना वो हस्ता चेहरा
ना रंग बिरंगे कपड़ों का त्योहार ही हैं

कोरोना काल में ये नया सफर कुछ अजब सा है
नीली पौशाक में एक सी दिखती आँखें भी बहुत अलग हैं
थोड़े डरे थोड़े उत्साहित और कुछ सीखने को तत्पर ये नए डॉक्टर
बस निकल पड़े हैं सब भूलकर किसी अनजान मंज़िल को पाने

उतार चढ़ाव हैं और ज़िम्मेदारी भी हैं
नींद खाना सब भूलकर ये बस चलते जा रहे हैं
किसी तरफ….
उस कोरोना डर के पास होते हुए भी उससे दूर

ये उम्मीद लिए की एक दिन
मुखौटे हटेंगे नीली वर्दी उतरेगी
और मिलेंगे अपने सह जनो से
क्या अलग होगा उस दिन में?

उस दिन जब कोरोना हार चुका होगा
और चेहरे स्पष्ट दिखेंगे
लोग तो वहीं होंगे
बस हर आँख से अनुमानित किया चेहरा शायद कुछ अलग हो
और कोरोना तो कुछ छाप छोड़ेगा ही हर चेहरे पर…

तो अभी तो ये नए डॉक्टर तने खड़े हैं
नीली वर्दी पहने मुखौटे लगाए
बस चलते जा रहे हैं किसी ओर
उम्मीद लिए की मंजिल वायरस की हार हो

-स्वरा


विविध कविता